ईरान पर अमेरिकी हमलों के पीछे का खतरनाक सच और अब्बास अराघची का बड़ा आरोप

ईरान पर अमेरिकी हमलों के पीछे का खतरनाक सच और अब्बास अराघची का बड़ा आरोप

पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त मध्य पूर्व पर टिकी हैं। तनाव चरम पर है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उनका साफ कहना है कि ईरान पर हमलों के जरिए वॉर क्राइम यानी युद्ध अपराध किए जा रहे हैं। यह कोई सामान्य सैन्य टकराव नहीं है। यह सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने जैसा है। अब्बास अराघची का बड़ा आरोप केवल एक बयान नहीं है बल्कि यह उस जमीनी तबाही की गवाही देता है जिसने सैकड़ों मासूमों की जान ले ली है।

क्या सच में अमेरिका इस पूरे खेल के पीछे का असली मास्टरमाइंड है? या फिर ईरान अपनी रक्षात्मक स्थिति को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा ले रहा है? इन सवालों के जवाब समझने के लिए हमें हाल ही में हुई कुछ बेहद दर्दनाक घटनाओं की तह तक जाना होगा।

मीनाब स्कूल हमला और अराघची का गुस्सा

बात मार्च 2026 की है। ईरान के मीनाब में स्थित शजरेह तैयबा स्कूल पर एक भीषण हवाई हमला हुआ। इस हमले में लगभग 170 से अधिक मासूम बच्चों और आम लोगों की मौत हो गई। ईरान का दावा है कि जांच में जो मिसाइल के टुकड़े मिले हैं, वे सीधे तौर पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल के संकेत देते हैं। यह बेहद गंभीर बात है।

अब्बास अराघची ने जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के सामने इस मुद्दे को बेहद आक्रामकता से उठाया। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि यह कोई हादसा नहीं था। यह जानबूझकर किया गया एक हमला था। जब आप एक स्कूल को निशाना बनाते हैं, तो उसे किसी भी तर्क से सैन्य कार्रवाई नहीं कहा जा सकता। यह सीधे तौर पर नरसंहार और वॉर क्राइम की श्रेणी में आता है। अमेरिका इस बात से मुकर नहीं सकता कि इन हमलों में इस्तेमाल होने वाले हथियार और खुफिया जानकारी उसी की दी हुई है।

नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना सबसे बड़ी चिंता

तनाव यहीं नहीं थमा। जुलाई 2026 के शुरुआती दिनों में दक्षिणी प्रांतों में फिर से हमले किए गए। इस बार निशाने पर सेना नहीं बल्कि आम लोगों के इस्तेमाल में आने वाले पुल और रेलवे रूट थे। गोर्गन से इंच बोरुन और मशहद से तेहरान जाने वाले रेल रूटों के दो बड़े पुलों को तबाह कर दिया गया।

ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए इसे "स्पष्ट युद्ध अपराध" करार दिया। अराघची का तर्क बिल्कुल सीधा है। आप युद्ध के नाम पर किसी देश के नागरिक बुनियादी ढांचे को नष्ट नहीं कर सकते। पुलों और रेलवे को निशाना बनाने से आम जनता का जीवन पूरी तरह से पटरी से उतर जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सीधा उल्लंघन है।

क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के तहत युद्ध के भी कुछ कड़े नियम होते हैं। जेनेवा कन्वेंशन साफ तौर पर कहता है कि सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों और नागरिक संपत्तियों को किसी भी कीमत पर नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।

  • सैन्य बनाम नागरिक संपत्तियां: नियमों के मुताबिक हमला केवल सैन्य ठिकानों पर हो सकता है। स्कूल, अस्पताल और परिवहन के साधन इस दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।
  • समानुपात का नियम (Proportionality): अगर किसी हमले से नागरिकों को होने वाला नुकसान सैन्य लाभ से कहीं अधिक है, तो उसे अवैध माना जाता है।
  • जवाबदेही: अराघची ने इसी कानूनी आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पत्र लिखकर तत्काल आपातकालीन सत्र बुलाने की मांग की है।

ईरान का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत उसे अपनी रक्षा करने का पूरा कानूनी अधिकार है। वे चुपचाप बैठकर तबाही नहीं देखेंगे।

अमेरिका और इजरायल का पक्ष क्या है

इस पूरे मामले पर अमेरिका और इजरायल का रवैया हमेशा की तरह टालमटोल वाला रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे इन रिपोर्टों की जांच कर रहे हैं और यह कोई सोची-समझी कार्रवाई नहीं बल्कि टारगेटिंग एरर (निशाने की चूक) हो सकती है। वहीं इजरायल इस बात से पूरी तरह इनकार करता है कि उसने जानबूझकर किसी नागरिक क्षेत्र को निशाना बनाया।

लेकिन क्या यह सफाई काफी है? 170 से अधिक बच्चों की मौत को केवल एक "गलती" कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं ने भी इस घटना की स्वतंत्र जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की है।

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अब आगे क्या होगा

यह जंग केवल मिसाइलों से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मेज पर भी लड़ी जा रही है। अब्बास अराघची ने तुर्की, ओमान और पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से बात करके एक क्षेत्रीय मोर्चा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। ईरान पूरी कोशिश कर रहा है कि अमेरिका को वैश्विक मंच पर अलग-थलग किया जा सके।

अगला कदम पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रुख पर निर्भर करता है। अगर वैश्विक समुदाय ने अब भी आंखें मूंद रखीं, तो यह संघर्ष एक ऐसे विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है जिसे रोकना किसी के बस में नहीं होगा। वक्त आ गया है कि बड़ी ताकतें अपनी जिम्मेदारी समझें और मासूमों की जान से खेलना बंद करें।

MG

Miguel Green

Drawing on years of industry experience, Miguel Green provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.