होर्मुज जलडमरूमध्य का नया संकट और समुद्र में फंसी 11 हजार नाविकों की जान

होर्मुज जलडमरूमध्य का नया संकट और समुद्र में फंसी 11 हजार नाविकों की जान

फारस की खाड़ी में महीनों से फंसे सैकड़ों जहाजों और हजारों नाविकों के लिए सुरक्षित बाहर निकलने की उम्मीदें एक झटके में टूट गईं। अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया शुरुआती समझौते के बाद लगा था कि हालात सुधरेंगे। संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संस्था (IMO) ने ओमान के तट के साथ एक सुरक्षित रास्ता तैयार किया था ताकि 600 जहाजों और करीब 11,000 नाविकों को सुरक्षित निकाला जा सके। लेकिन गुरुवार को ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले एक मालवाहक जहाज 'एवर लवली' पर हुए संदिग्ध ड्रोन या मिसाइल हमले ने सब कुछ ठप कर दिया। इसके ठीक बाद IMO को अपना पूरा इवेक्यूएशन प्लान रोकना पड़ा।

यह घटना दिखाती है कि वैश्विक राजनीति में समुद्र के रास्ते कितने असुरक्षित हो चुके हैं। जब तक दोनों देश एक ठोस समझौते पर नहीं पहुंचते, तब तक इन नाविकों की जिंदगी दांव पर लगी रहेगी।

क्यों खतरनाक साबित हुआ नया समुद्री रास्ता

इस साल फरवरी के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद था। ईरान ने इस मुख्य समुद्री मार्ग के बीच में बारूदी सुरंगें (सी-माइंस) बिछा दी थीं। इस वजह से दुनिया के कुल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पांचवां हिस्सा ढोने वाला यह रास्ता पूरी तरह ठप हो गया था। हाल ही में हुए एक समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच 60 दिनों का संघर्ष विराम बढ़ा और जहाजों को निकालने की कोशिश शुरू हुई।

IMO और ओमान ने मिलकर एक वैकल्पिक मार्ग तैयार किया जो ओमान के तट के करीब से गुजरता है। इस हफ्ते की शुरुआत में कई जहाजों ने इस रास्ते का इस्तेमाल भी किया। लेकिन ईरान को यह मंजूर नहीं था। ईरान के नए बने 'पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने साफ चेतावनी दी कि तेहरान की अनुमति के बिना किसी भी नए मार्ग का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित और बेहद खतरनाक है।

ईरान का कहना है कि होर्मुज से गुजरने का केवल वही एक रास्ता वैध है जो उसने खुद तय किया है। इसके अलावा किसी भी अन्य रूट से जाने वाले जहाजों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी।

एवर लवली पर हमला और बढ़ती दहशत

गुरुवार को जिस जहाज पर हमला हुआ उसकी पहचान सिंगापुर के 'एवर लवली' के रूप में हुई है, जिसका मालिकाना हक एवरग्रीन शिपिंग कंपनी के पास है। यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) के मुताबिक जहाज के दाहिनी ओर किसी अज्ञात उड़ती हुई वस्तु या प्रोजेक्टाइल से टक्कर हुई जिससे उसके ब्रिज एरिया को नुकसान पहुंचा। अच्छी बात यह रही कि इस हमले में कोई हताहत नहीं हुआ और न ही किसी तरह का समुद्री प्रदूषण फैला।

अमेरिकी अधिकारियों ने सीधे तौर पर ईरान को इस हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि ईरान ने आधिकारिक रूप से इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन उसके तेवर साफ इशारा करते हैं। इस हमले के ठीक बाद आईएमओ के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज ने बयान जारी कर इस निकासी अभियान को तुरंत रोकने की घोषणा की। उनका कहना था कि जब तक क्षेत्र में जहाजों और नाविकों की सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं मिल जाती, तब तक यह अभियान ठप रहेगा।

यह हमला उस समय हुआ जब कुछ ही घंटे पहले ईरान ने जहाजों को चेतावनी दी थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक ईरानी नौसेना ने पनामा के झंडे वाले कई तेल टैंकरों जैसे ब्लू स्टार 1, एसजी पेगासस, अजुमसान और ओमेगा ट्रेडर को बीच रास्ते से ही वापस लौटने या मार्ग बदलने पर मजबूर कर दिया। रेडियो पर नाविकों को सीधे तौर पर धमकी दी जा रही थी कि वे ईरानी मिसाइलों की रेंज में हैं और उन पर हमला किया जा सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर असर

होर्मुज जलडमरूमध्य में जरा सी भी हलचल पूरी दुनिया की जेब पर भारी पड़ती है। इस ताजा हमले और संयुक्त राष्ट्र के कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में दो फीसदी से ज्यादा का उछाल देखा गया। शिपिंग कंपनियों और समुद्री बीमा करने वाली संस्थाओं का जो भरोसा पिछले कुछ दिनों में थोड़ा बहुत बना था, वह अब पूरी तरह खत्म हो चुका है।

युद्ध से पहले इस रास्ते से हर दिन करीब 130 से अधिक मालवाहक जहाज गुजरते थे। युद्ध के दौरान यह संख्या घटकर नाममात्र रह गई थी। पिछले हफ्ते कुछ सुधार हुआ और 125 जहाज गुजरे, लेकिन ताजा हमले के बाद अब कोई भी कंपनी अपने करोड़ों डॉलर के जहाजों और नाविकों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहती।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस समय खाड़ी देशों के दौरे पर हैं और उन्होंने साफ कहा है कि अमेरिका इस नए समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। अगर जहाजों की आवाजाही रुकती है, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा संकट बन जाएगा। अमेरिका और खाड़ी देशों ने मिलकर एक संयुक्त बयान में ईरान के मिसाइल और ड्रोन नेटवर्क पर लगाम लगाने की मांग की है।

नाविकों की सुरक्षा के लिए अब क्या कदम जरूरी हैं

इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा नुकसान उन 11,000 नाविकों का हो रहा है जो पिछले चार महीनों से अपनी जान हथेली पर रखकर समुद्र के बीच फंसे हैं। वे किसी युद्ध का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन फिर भी उन्हें बंधक जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

अब आगे का रास्ता सिर्फ बयानों से नहीं निकलेगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और शिपिंग कंपनियों को तुरंत कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।

सबसे पहले आईएमओ और ओमान को ईरान के साथ सीधे टेबल पर बैठकर सुरक्षा गारंटी पर बात करनी होगी। जब तक ईरान इस वैकल्पिक रास्ते को मान्यता नहीं देता, तब तक इस रूट पर जहाजों को भेजना आत्मघाती होगा।

दूसरा रास्ता यह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की नौसेना इन फंसे हुए जहाजों को सीधे मिलिट्री एस्कॉर्ट देकर बाहर निकाले, जैसा कि पहले भी कुछ मौकों पर किया गया है।

तीसरा और सबसे जरूरी कदम यह है कि वैश्विक शिपिंग कंपनियां अस्थाई तौर पर इस पूरे क्षेत्र के लिए नए रूट प्लान करें, भले ही उसमें समय और लागत ज्यादा लगे। नाविकों की सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए।

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यह संकट केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाने जैसा है। अगर संयुक्त राष्ट्र इस समय कड़ा रुख नहीं अपनाता, तो भविष्य में वैश्विक व्यापार पूरी तरह से चंद देशों की मनमर्जी पर निर्भर हो जाएगा।

EJ

Elena Jackson

Elena Jackson is a prolific writer and researcher with expertise in digital media, emerging technologies, and social trends shaping the modern world.